राष्ट्रविरोधी है विदेशी विश्वविद्यालय विधेयक
विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में बुलाने और उन्हें पैर जमाने देने के लिए प्रयासरत कांग्रेस सरकार के लिए यह खबर कुनैन की गोली से कम कड़वी नहीं होगी कि शिक्षा जगत और राष्ट्रवादी शक्तियों के अलावा अपनी ही पार्टी के भीतर से इस विधेयक का विरोध शुरू हो गया है। मनमोहन सिंह-नीत गठबंधन सरकार ने जिस तरह आंख मूंद कर इस राष्ट्रविरोधी विधेयक को पेश संसद में पेश किया है वह न केवल राष्ट्रीय गरिमा को गंभीर क्षति पहुंचाने वाला है बल्कि इस बात का प्रमाण भी है कि सरकार में ऐसी ताकतें शामिल हैं जो देश को प्रच्छन्न रूप से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का पिछलग्गू बनाने को आतुर हैं।
यद्यपि राजनीतिक दलों ने इस विधेयक का विरोध इसके कुछेक प्रावधानों को लेकर शुरू किया है, लेकिन यह स्थिति भी किसी तरह से राहत देने वाली नहीं कही जा सकती। वस्तुतः, यह विधेयक संकल्पना से लेकर प्रस्तुतीकरण तक घोर भारत-विरोधी है। भारत विरोधी इसलिए कि देश में उपलब्ध उच्च शिक्षा को आधारहीन अवधारणाओं के सहारे सिरे से घटिया, समय से पिछड़ी हुई और अनुपयुक्त बताते हुए अमेरिका, यूरोप और दूसरे देशों में घूम-घूम कर भारत में विश्वविद्यालय की स्थापना करने की चिरौरी करने वाले कांग्रेसी मंत्री कपिल सिब्बल इस सवाल का जवाब नहीं देना चाहते कि अगर यहां उपलब्ध शिक्षा इतनी ही खराब है तो अमेरिका और दूसरी बड़ी ज्ञानाश्रित अथर्व्यवस्थाओं को भारतीयों का डर क्यों सता रहा है? क्या इस भय की अनदेखी तब भी की जा सकती है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने खुले आम ऐसा कहा हो। ओबामा ने अमेरिकी समाज में बैठे इस भय को स्वर न भी दिया होता तो क्या इस बात से आंखें मूंदी जा सकती हैं कि अमेरिकी बौद्धिक सम्पदा में सबसे बड़ी विदेशी भागीदारी भारतीयों या भारतवंशियों की है। ब्रिटेन की भी यही स्थिति है। अंग्रेजी से इतर भाषाओं का प्रयोग करने वाली दुनिया में भारतीयों का भय कम है तो केवल इसलिए कि भारतीयों ने उन भाषाओं की ओर ध्यान नहीं दिया या ऐतिहासिक कारणों से अंग्रेजी यहां दूसरी मुख्य भाषा के रूप में विकसित हुई।
विदेशी विश्वविद्यालयों को अच्छा मानने का पैमाना क्या है? क्या ऐसा किसी वास्तविक शोध का निष्कर्ष है? या, केवल कुछ विदेशी संगठनों द्वारा अपने अनुकूल मानकों पर की गई रेटिंग का प्रभाव? या, फिर वहां हो रहे शोधों की अधिकता या अंतरराष्ट्रीय प्रभावोत्पादकता के कारण?
यह ठीक है कि यहां की उच्च शिक्षा व्यवस्था में कमियां हैं, पर किस देश की उच्च शिक्षा को आप कमियों से मुक्त बता सकते हैं? ऐसा हो जाए तो उस तंत्र को किसी सुधार या नये प्रयोग की जरूरत ही नहीं रह जाएगी। अपनी कमियां ठीक करने की गरज नहीं, दूसरों को जाने-बूझे बगैर अच्छा बताने और बुलाने की उतावली। ऐसा क्यों है और यह राष्ट्र के लिए कैसे हितकर हो सकता है? क्या विदेशी विश्वविद्यालय आपके राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर पाठ्यक्रम विकसित करेंगे? या, वे चाहेंगे कि मेधावी भारतीयों को उनके अपने राष्ट्र के नागरिकों की तुलना में बेहतर वैश्विक अवसर मिलें? वे कौन से तर्क हैं जिनके सहारे देश को फिर से गुलाम बनाने का साधन पैदा किया जा रहा है? क्या यह पूंजीवादी साम्राज्यवाद के पुरोधाओं के मंतव्यों को पूरा करने में लगी रहने वाली सीआईए जैसी एजेंसियों की शह पर किया जाने वाला कृत्य नहीं माना जाना चाहिए?

A fact which every Indian needs to know.
Thanks for supporting the view. More and more concerned people need to know and voice their opinons to stall the vicious move.
इस नए चिट्ठे के साथ हिंदी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
धन्यवाद, संगीता जी।
आपके ब्लॉग पर आकर कुछ तसल्ली हुई.ठीक लिखते हो. सफ़र जारी रखें.पूरी तबीयत के साथ लिखते रहें.टिप्पणियों का इन्तजार नहीं करें.वे आयेगी तो अच्छा है.नहीं भी आये तो क्या.हमारा लिखा कभी तो रंग लाएगा. वैसे भी साहित्य अपने मन की खुशी के लिए भी होता रहा है.
चलता हु.फिर आउंगा.और ब्लोगों का भी सफ़र करके अपनी राय देते रहेंगे तो लोग आपको भी पढ़ते रहेंगे.
सादर,
माणिक
आकाशवाणी ,स्पिक मैके और अध्यापन से सीधा जुड़ाव साथ ही कई गैर सरकारी मंचों से अनौपचारिक जुड़ाव
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Thanks you, Mr. Manik.
कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,
धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,
कलम के पुजारी अगर सो गये तो
ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।
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