पिता से क्षमा याचना

Late Shri BBL Asthana
मेरे पिता!
मुझे नहीं पता कि मैं कैसे मांगू
अपनी अनगिनत गलतियों की माफी
जो मैंने की थीं, तुम्हारे प्रति
अब जबकि तुम उपस्थित नहीं हो स्थूल में।
तुमने मुझे पाला था अपनी पलकों पर
नाचते थे मुझे लेकर
ताने भी सुनते थे कि सिर चढ़ा रखा है
मेरे हर काम में तु्म्हें
दिख ही जाती थी कोई न कोई अच्छाई
जो दुनिया के किसी और लड़के में नहीं थी
तुम्हारे सपनों के केंद्र में मेरे सिवा कुछ भी तो नहीं था
भोर में मंत्रों की भुनभुनाहट के बीच
मुझे जगाते हुए, या
फिर देर रात अपनी दिनचर्या समाप्त करने के पहले
किसी न किसी वजह से मुझे बुलाते हुए
कुछ तो था जो तुम नहीं बांटते थे औरों से।
आज के दौर जैसे पिता-पुत्र नहीं थे हम
न ही थे पुराने दौर के पिता-पुत्रों जैसे हमारे रिश्ते।
तुमने ही बोया था मुझमें सत्यनिष्ठा और तर्क का पौधा
तुम्हीं से सीखा होगा मैंने आंख मूंद कर सहमत न होना
तुम्हीं ने सिखाया था गर्व से जीना और
अपने तर्कों को कसौटी पर कसते हुए दृढ़ता से उन पर टिके रहना।
समय रहते, मैं ही नहीं सीख पाया था
तर्कों के घेरे से ऊपर उठना
तीव्र प्रवाह के बीच पड़ने वाले भंवरों से
बच कर आगे निकल जाना।
मेरे पिता प्रिय! क्षमायाची हूं
उन हजारों बातों के लिए जिन्हें समझ
नहीं पाया था, समझने के वक्त।
क्षमायाची हूं तुम्हारी हजारों प्रेमिल अपेक्षाओं को
पूरा करने की परवाह तक न करने की।
तुम्हारी जिन तकलीफों को समझ नहीं पाता था तब
वे सब समझ में आती हैं तुम्हारे पोते-पोतियों का पिता बन कर।
प्राकृतिक न्याय की गलियों से गुजर कर
पहुंच सका मैं जिन सत्यों की तह तक
उन तक समय से पहुंचने का धैर्य रहा होता मुझमें
तो न पहुंचती पीड़ा तुम्हें अपने प्रिय पुत्र के कारण।
मैं जानता हूं कि आधी रात के एकांत में भी
की होती क्षमा याचना तो न केवल मुझे करते क्षमा
बल्कि जगा लेते पूरे शहर को यह बताने के लिए कि
तुमने माफ कर दिया है अपने बेटे को उसके सभी अपराधों के लिए।
हे पिता, मैं क्षमादान और प्रेम की याचना करता हूं
सावर्जनिक रूप से ताकि लोग जान लें कि
मेरे पिता को है मुझसे अथाह और अविरल प्रेम।
श्रीकांत
