अयोध्या विवाद – परेशान हूं गुमराह करने पर आमादा साजिशों से
मन आज बहुत खिन्न है, और विचलित भी। पिछले 10 दिनों से तबीयत ठीक नहीं होने से इंटरनेट पर बैठने या कुछ खास करने की इच्छा नहीं हो रही थी, लेकिन कल से मैं ज्यादा परेशान हूं। तबीयत से नहीं, अपने इर्द-गिर्द के माहौल में से। बाढ़ के दौरान नदियों में उफना आने वाली गंदगी, टहिनयों, कूड़ा-कबाड़ और मिट्टी-रेत के जैसे पूरे देश के माहौल में अपने गंदे बयानो, चेतावनियों, सलाहों, कवायदो और लप्पेबाजियों से तिल का ताड़ बनाने पर आमादा लोगों और उनकी हरकतों से।
अयोध्या में विवादित स्थल के मालिकाना हक पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के फैसले को लेकर राजनेताओं, प्रशासन और मीडिया उपक्रमों की बयानबाजियों-लफ्फाजियों ने अनायास ही इस सामान्य से न्यायिक निर्णय को ‘सदी का सबसे बड़ा फैसला’ बताते हुए पूरे देश में आम लोगों को गुमराह करने की साजिश खुले आम रच डाली है। ध्यान रखिये कि ये वही ताकतें हैं जिन्होंने पहले भी इस मुद्दे को बेवजह तूल देकर राष्ट्रीय जीवन में अविश्वास और घृणा का जहर घोला था।
आने वाला यह फैसला कैसे बड़ा है? गवाहियों की संख्या के हिसाब से? इस तक पहुंचने में लगे समय के लिहाज से ? या फिर, लोगों को गुमराह किए जाने संभावनाओं के पैमाने से? विश्व इतिहास में ही नहीं संभवतः भारतीय इतिहास में भी इस मुकदमे से ज्यादा लम्बे समय तक चले और इससे ज्यादा गवाहों को मौका देने वाले मुकदमे मौजूद हैं।
फिर किस बात का बड़ा फैसला? क्या ये बड़ा फैसला-बड़ा फैसला ढोल पीटने वाले नहीं जानते कि यह अंतिम फैसला नहीं है? इससे असहमत पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए स्वतंत्र होगा? जब अंतिम फैसला तक नहीं है, तो बड़ा किस बात का? और ये जो राजनेता शांति की अपीलों की बौछार कर रहे हैं, ये क्या है? आपको इस बात की आशंका ही क्यों है कि अशांति होगी? और आशंका है तो उसे रोकने के लिए क्या जरूरी प्रशासनिक उपाय कर लिए गए हैं? अगर नहीं, तो वे उपाय कीजिए? आपके पास कोई आत्मबल हो तब तो आप समझेंगे कि लोग उतने मूर्ख नहीं हैं जितना आप समझते हैं? क्या इन राजनीतिक दलों के नेताओं में से किसी में गांधी जैसा नैतिक बल है कि लोग उसकी बात मानने को मजबूर हों? किसी का आचरण इतना शफ्फाक है कि लोग उसे अपने आदर्श के रूप में देखना पसंद करें? बेइमानियों, लूट-खसोट और लोगों को बांटने के साथ ही पूरे राष्ट्र को आतंकित करके सत्ता में बैठे रहने का जतन करने रहने वाले इन लोगों की अपीलों का क्या अर्थ है? क्या इन्हें इतना भी पता नहीं कि किसी बात पर जरूरत से ज्यादा सतर्कता बरतने को कहना दरअसल नुकसान को दावत देने जैसा होता है? फैसला आने के अंदेशे में यह अतिरंजित प्रतिक्रिया क्यों की जा रही है?
इनसे भी एक हाथ आगे हैं मेरे वे दोस्त जो खुद को पत्रकार और सम्पादक मानते नहीं अघाते? खास तौर पर नए माध्यम में बैठे लोग- जिनकी पत्रकारीय आंख भी तब नहीं खुली थी जब इस मुद्दे पर मुठ्ठी भर लोगों की साजिश ने पूरे देश को एक बेहूदा दौर में झोंक दिया था। आप आश्वासन दे रहे हैं जिम्मेदार आचरण का और करते हैं निहायत गैर-जिम्मेदाराना हरकत? आपके प्रस्तोता अपने कायर्क्रम के दौरान फेफड़ों में जितनी हवा भर सकते हैं और आवाज में जितनी लरजिश पैदा कर सकते हैं उसके साथ अपने कायर्क्रमों को बेचने में जुटे हैं। ये रिसर्च, वो मोन्टाज, ये विश्लेषण, वो बयान और जाने क्या-क्या..। मानो, अदालत का फैसला न हुआ प्रलय के आने की सूचना हो गई।
टीवी वाले ही क्यों, अखबारों ने भी क्या कसर छोड़ रखी है? सुबह अखबारों का बंडल खोला तो एक बड़े सम्पादक जी अपने अखबार के ऊपरी हिस्से में शांति, संयम, प्रगति, और भारतीय परम्परा की खिचड़ी पकाते मिले। वे समझते होंगे कि लोगों को याद नहीं होगा कि जब वे रिपोर्टर थे तब उन्होंने अपने नामचीन हिंदी अखबार को दूसरे हिंदी अखबार से बड़ा बनाने की होड़ में बिना इतना कुछ हुए रामभक्तों के रक्त से सरयू का पानी लाल करवा दिया था और ट्रकों में भर कर लाशें अयोध्या से काफी आगे सरयू (घाघरा) में बहवा दी थीं? उनका अखबार खूब उछला? जवाबी कार्रवाई में दूसरे अखबार ने जो करना था सो किया? रिपोर्टर साहब को इनाम मिला? दूसरे अखबार को भी इनाम मिला? लुटा पिटा तो देश.. और वे मच्छर-भुनगे लोग जिनके होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
फिर वैसी ही घड़ी बनाने की साजिश का इन लोगों को मौका मिला है। जिन्हें बीस साल पहले का दौर ढंग से याद नहीं और जो इन बीस सालों में देश में आए बदलावों को जानने से रह गए हों उन्हें भी एक बार फिर से ‘टीप’ मारने की इन कोशिशों को लोगों की खुली आंखे शायद ही सफल होने दें। हां, आंख में धूल झोंक कर कोई धौल जमा जाए तो अलग बात है?
एक बात और इस फैसले के बाबत! मालिकाना हक पर अदालत का फैसला जो भी हो उससे अलग एक सवाल यह है कि जब किसी विवादग्रस्त स्थान पर आम आदमी तक नहीं रहना चाहता तो वहां ईश्वर कैसे रह सकता है ? उस जगह पर कोई मसजिद कैसे बन सकती है जब किसी विवादित स्थान पर अदा की गई नमाज कुबूल ही नहीं हो सकती? और, कोई मंदिर कैसे बन सकता है जब किसी अशांत और विवादित स्थान पर किसी देव प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा ही नहीं की जा सकती? या मंदिर बनाने के लिए यज्ञ के समय शांति मंत्रों का उच्चारण करने भर से वहां शांति स्थापित हो जाएगी? जब वहां इन दोनों में से कुछ हो ही नहीं सकता तो झगड़ा किस बात का है? नाक का ? .. तो पिनोशियो की नाक बहुत लम्बी थी, लेकिन उसकी वजह से हर वक्त कोई न कोई मुसीबत बनी रहती थी…। पिनोशियो बनने से बाज आइये… नाक कटती है तो कट जाने दीजिए वरना तो यह अंतहीन सिलसिला है जो हमारे-आपके बाद की पीढियों में जाकर खत्म हो तो हो।
इसे अपलोड करने के पहले अदालत अपना फैसला सुना चुकी है और लोक तथा राष्ट्रीय सहमति की जितनी संभावना इस फैसले के साथ पैदा हुई है शायद उतनी इससे पहले कभी न रही हो। लेकिन जो असहमत ही रहना चाहते हैं उन्हें इससे क्या?
